प्रीतम नामक गांव मे सुनीता अपने दो बच्चो और पति सुरेश के साथ रहती थी। सुनीता का परीवार बहुत गरीब था। सुनीता का पति मज़दूरी करता था और उसका घर उसके पति के मज़दूरी से आये पैसो से चलता था। उन्हे एक वक्त की रोटी भी बहुत मुश्किल से मिलती थी।सुरेश की माँ बहुत बीमार रहती थी। उनकी ज़िंदगी ऐसे ही चल रही थी। एक दिन अचानक उसका पति बीमार हो जाता है उसे भूकर हो जाता है और पैसो की कमी होने के कारंड उसे इलाज नहीं मिल पता है जिसके कारण उसकी मौत हो जाती है। सुरेश का एक भाई होता है जो बहुत मतलबी और चालक आदमी है। उसका नाम शाम होता है। उसने अपने भाई की मौत के बाद थोड़े दिन सुरेश के बच्चो और उसकी पत्नी और अपनी माँ का ख्याल रखने का दिखावा किया और थोड़े दिनों बाद शाम अपनी माँ से सुरेश की खेती बाड़ी की ज़मीन को धोके से हथिया लेता है और उसे किसी बड़े से सेठ बेच के फरार हो जाता है।
सुरेश की माँ रोते होए : मैंने कैसा बीटा पैदा की जो धोके के से अपनी भाई की ज़मींन को हथिया लेता है। अब हमारा क्या होगा।
सुनीता के ऊपर एकदम काफी सारी मुसीबतो का पहाड़ टूट जाता है। वह बहुत परेशान रहने लगी। वह सोचती है।
सुनीता ( सोचते हुए ) : मैंने तो कभी भी कोई काम नहीं किया है। मुझे तो कोई काम आता भी नहीं। मै अपने बच्चो और सास का ख्याल कैसे रखूंगी। भगवन ने ये अन्याय हमारे साथ क्यों किया। घर का एक मात्र सहारा दूर कर दिया।
कुछ दिनों के बाद खाने का समान जो थोड़ा बहुत पड़ा था वो भी खतम हो गया। अब घर मेँ खाने के लिए न ही राशन था और न ही राशन खरीदने के लिए पैसे। सुनीता ने अपनी सास से कहा।
सुनीता : माँ जी घर मेँ जितना राशन था और जितने पैसे थे वो सारे खतम हो गए। कुछ दिन तो बीत गए पर अब आगे के लिए कुछ सोचना पड़े गा।
थोड़े दिनों तक उन्होने आसपरोस के लोगो के कारंड अपना गुज़ारा किया।पर धीरे धीरे लोगो ने उन्हे उनके हालात पर छोड़ दिया। सुनीता अपने बच्चो से कहते हुए।
सुनीता : बच्चो आज घर मेँ थोड़ा सा ही राशन पड़ा है जिससे आज का ही खन्ना बन सकता और फिर कल से मुझे काम धूनदने जाना पड़ेगा। मै बहुत परेशान हूं की मै किसके सहारे तुम्हे छोड़ कर जाऊं गी। तुम्हारी दादी का ख्याल कोन रखेगा।
सुनीता अपने बच्चो और दादी को खाना देती है और थोड़ा सा खन्ना अपने लिए बचा कर खा रही होती है की वो देखती है उसके घर के बहार कोई बुढ़िआ खड़ी है ।सुनीता अपने बिस्तर से उठती है और दरवाजे की और जाती और बुड़िया से कहती है:-
सुनीता: क्या होआ माँ जी। आप बड़ी भूकी लगरही हो।
बुढ़िया: हाँ बेटी मैंने कल रात से कुछ नहीं खाया है।कुछ खाने को है तोह देदो।
सुनीता: हाँ माँ जी अभी लाती हूँ।
सुनीता अंदर जाती है और जो खाना उसने अपने लिए बचाया था वो लाकर बुढ़िया को दे देती है।
बुढ़िया: क्या hua बेटी बड़ी परेशान लग रही हो।
वो बुढ़िया को सारि कहानी बताती है।
सुनीता: तोह अब मै क्या करू न मै अपने बच्चो को छोड़ कर बहार काम करने जा सकती हूं और काम नहीं करोगी तोह घर कौन चलाएगा।
बुढ़िया: बेटी तुम खाने का ठेला क्यों नहीं लगाती तुम बहुत अच्छा खाना बनाती हो और यह लो जादुई गोली इसे अगर अपने खाने मे डालो गी तोह तुम्हारे खाने को खाकर लोग ऊँगलियाँ चाट ते रह जाएगे।
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